हमारे ज्योतिष आचार्यों ने संपूर्ण ब्रह्मांड को 360 डिग्री में बांटा है जिसमें 12 राशि होती है इन 12 राशियों में 27 नक्षत्र होते हैं प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं ।
इस प्रकार 27 * 4 = 108
किसी भी जप अनुष्ठान व्रत में माला जपने का अपना महत्व होता है जिसमें 108 मोती होते हैं ये 108 मोती 27 नक्षत्रों के चारों चरण का प्रतिनिधित्व करते हैं
नक्षत्रों के गृह स्वामी :
- केतु:- आश्विन, मघा, मूल।
- शुक्र:- भरणी, पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा।
- रवि:- कार्तिक, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा।
- चन्द्र:- रोहिणी, हस्त, श्रवण।
- मंगल:- मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा।
- राहु:- आर्द्रा, स्वाति, शतभिषा।
- बृहस्पति:- पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वा भाद्रपद।
- शनि:- पुष्य, अनुराधा, उत्तरा भाद्रपद।
- बुध:- आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती।
गंडमूल नक्षत्र (बुध केतु द्वारा शासित) :
आश्लेषा, माघ, ज्येष्ठ, मुल, रेवती और अश्विनी
इन नक्षत्र में जन्म लेने वाले बालक को जीवन में बहुत सी कठिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है इसीलिए इन नक्षत्र में जन्म लेने वाले बालक की मूल नक्षत्र शांति पूजा अवश्य कराना ही चाहिए ।
पंचक नक्षत्र :
दूसरे चरण से धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती
पंचक नक्षत्रों में भी शास्त्रों में कुछ कार्य वर्जित बताए हैं जैसे दाह संस्कार, दक्षिण दिशा की यात्रा, मकान का रंग व प्लास्टर आदि करना ।
नक्षत्र शांति पूजा के उद्देश्य-:
जन्म के समय के नक्षत्र के अशुभ प्रभाव को दूर करना ।
नक्षत्र शांति पूजा प्रत्येक वर्ष जन्मनक्षत्र पर की जा सकती है इसमें सप्त चिरंजीवी पूजा, ग्रह शांति पूजा, नवग्रह शांति पूजा, शांति हवन व मृत्युंजय हवन आदि शामिल है।
आप हमसे नक्षत्र शांति हेतु निसंकोच परामर्श प्राप्त कर सकते हैं ।
